*एक नयी गजल*
उलझा हुआ सा मैं हूँ तो खोयी हुई सी तुम
रहती बहुत हो आजकल सहमी हुई सी तुम
ठहरे हुए लम्हात सव भर आँखों में लिए
मदमस्त पुरवाई हवा बहती हुई सी तुम
खामोशियाँ लब से कभी होती नही जुदा
हो ख्वाब में जैसे कहीं वहकी हुई सी तुम
कोई बताये किस तरह होंगे फनाह हम
मुझसे मैं खुद रूठा-रूठा रूठी हुई सी तुम
बढ़ने लगी है फ़िक्र अब दिल-ओ-दिमाग में
कुछ रोज से देखी नहीं हसती हुई सी तुम
शातिर हवाएं प्यार का दीया बुझा न दें
बारिश भरी दोपहर में जलती हुई सी तुम
By- नरेन्द्र सांतरुक
. Mob-8502972021
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